साढ़े नैना विच गुरूजी का रूप बसेया नैन खोला किवे

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॥ पावन पाठ ॥

साढ़े नैना विच गुरूजी का रूप बसेया नैन खोला किवे,

नैन खोला किवे॥

साढ़े नैनो में गुरूजी का रूप बसेया,

नैन खोल दिते लोकि मैनु पुछदे,

किथों लभ्या लाल कुझ दस दे,,

एहना सुन के मैं पलका न होर कसया

नैन खोला किवे,

साढ़े नैनो में गुरूजी का रूप बसेया,

रूप रब दा तू जग विच आ गया,

तीना लोका विच धुमा ओ पा गया,

शुबहा सुन के ते धरती अम्बर हास्या,

नैन खोला किवे,

साढ़े नैनो में गुरूजी का रूप बसेया,

तेरे नाम ने ही जग न तारीया,

जिथे नाम लिश्कारा तेरे मारियाँ,

ओथो पला च हनेरा सारा गया नसया,

नैन खोला किवे॥

साढ़े नैनो में गुरूजी का रूप बसेया,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।