प्रेम तुम्हरा मुझको झुँझन खींच लाता है

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॥ पावन पाठ ॥

बहदो का जब जब माँ मेला आता है,

प्रेम तुम्हरा मुझको झुँझन खींच लाता है,

आँखों में जब तेरा चेहरा आता है,

प्रेम तुम्हरा मुझको झुँझन खींच लाता है,

झुंझनू की गांव की वो तंग गलियां,

मंदिर के बगीचे के फूलो की बगियाँ.

झुंझुनू की माटी की खुस्भु सुहानी,

दादी के चरणों का वो निर्मल पानी,

दर्शन तेरे करने से सब मिल जाता है,

प्रेम तुम्हरा मुझको झुँझन खींच लाता है,

मेले में जाते हम तो अकेले मिलते वही पे खुशियों के रेले,

दादी के भगतो का ऐसा परिवार है,

दादी के प्रेम का मिलता उपहार है,

रह रह के ख्यालो में जब ये आता है,

प्रेम तुम्हरा मुझको झुँझन खींच लाता है,

ऐसा क्या तुमने जादू चलाया मोहित को तूने अपना बनाया,

आँखों से अश्क का बेहता सैलाब है,

याद में दादी तेरी दिल बे ताब है,

ऐसा क्यों होता है समज न आता है,

प्रेम तुम्हरा मुझको झुँझन खींच लाता है,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।