तेरे सनेह के सागर में

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

तेरे सनेह के सागर में,

तू ही समाये रहते हो,

जग तो जग ही रहा बाबा,

हम खुद से पराये रहते है,

तेरे सनेह के सागर में

दिल में तू आन वसा बाबा जैसे सीत में जोति रहती है,

पलकों में ऐसे छुपा है तू जैसे नैन की ज्योति होती है,

पलके जो उठती ओ बाबा सामने तुझको पाए है,

तेरे सनेह के सागर में......

ज़माने के कई रंगो में रंगा था खुद को ओ बाबा,

अब तो फीके लगते है सब जब से देखा तुझे बाबा,

सारे रंग जहां के मैंने तुझमे ही पाए है,

तेरे सनेह के सागर में....

खुशनसीबी है अपनी के तुझको जान लिया बाबा,

मन में भी अनुभव किया इतना दिल ने पहचान लिया बाबा,

तुझको पाकर के ओ बाबा तीनो जहां पाए है,

तेरे सनेह के सागर में

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।