भोले के दर चलो

पारंपरिक
महादेव भजन शिव भजन shiv
॥ पावन पाठ ॥

गंगा से गंगा जल भर के कंधे शिव की कावड़ दर के,

भोले के दर चलो लेके कावड़ चलो,

सावन महीने का पावन नजारा,

अध्भुत अंखोखा है भोले का नजारा,

सावन की जब जब है बरसे बदलियां,

झूमे नाचे और बोले कावड़ियाँ,

भोले के दर चलो....

रस्ता कठिन है और मुश्किल डगर है,

भोले के भक्तो को ना कोई दर है,

राहो में जितने भी हो कांटे कंकर,

हर इक कंकर में दीखते है शंकर,

भोले के दर चलो......

कावड़ तपस्या है भोले प्रभु की,

ग्रंथो ने महिमा बताई कावड़ की,

होठो पे सुमिरन हो पैरो में छाले,

रोमी तपस्या हम फिर भी कर डाले,

भोले के दर चलो......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।