तेरा पता मालूम नहीं

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॥ पावन पाठ ॥

भगवान् तुझे मैं ख़त लिखता पर तेरा पता मालूम नहीं।

रो रो लिखता जग की विपदा, पर तेरा पता मालूम नहीं॥

तुझे बुरा लगे जा भला लगे, तेरी दुनिया अपने को जमी नहीं।

कुछ कहते हुए डर लगता है, जहाँ कुत्तों की कुछ कमी नहीं।

मालिक लिख सब कुछ समझाता, पर तेरा पता मालूम नहीं॥

मेरे सर पे दुखों की गठरी है, रातों को नहीं मैं सोता हूँ।

कहीं जाग उठे ना पडोसी, इस लिए जोर से मैं नहीं रोता हूँ।

तेरे सामने बैठ के मैं रोता, पर तेरा पता मालूम नहीं॥

कुछ कहूँ तो दुनिया कहती है, आंसू ना बहा, बकवास ना कर।

ऐसी दुनिया में मुझे रख कर, मालिक मेरा सत्यानास न कर।

तेरे पास मैं खुद ही आ जाता, पर तेरा पता मालूम नहीं॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।