अब तुम बिनु कछु नाहीं भावत कान्हा

पारंपरिक
श्री कृष्ण भजन कृष्ण भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

अब तुम बिनु कछु नाहीं भावत कान्हा,

जिय गति जल बिनु मीन की नाईं,

मोहें काहे नाहीं दरस दिखावत कान्हा,

अब तुम बिन कछु नाहीं भावत कान्हा....

अधरन गीत भ्रमर नाहीं गूंजत,

मोरे हिंय हिलोर नाहीं आवत कान्हा,

अब तुम बिन कछु नाही भावत कान्हा.....

मिथ्या जगत रास नाहीं मोहें,

काहे चरनन नाहीं लगावत कान्हा,

अब तुम बिनु कछु नाहीं भावत कान्हा........

ऊर धरि नाथ तोहें बस ध्याऊँ,

मोहें काहे नाहीं दास बनावत कान्हा,

अब तुम बिनु कछु नाहीं भावत कान्हा.....

आभार: ज्योति नारायण पाठक

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।