शूकर दातिया तेरा शूकर दातिया

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

शूकर दातिया तेरा शूकर दातिया,

ज़िंदगी रही है गुजर दातिया,

शूकर दातिया तेरा शूकर दातिया,

आम रहा या ख़ास होवा मैं एह कदे ना चावा मैं,

मूल मेहनत दा पे जावे इहे करा दुआवा मैं,

बस एहना बख्शदे हुनर दतिया,

शूकर दातिया तेरा शूकर दातिया,

कई पैरा तो नंगे फिरदे सिर ते लभन शावा,

मैनु दाता सब कुछ दिता क्यों न शूकर मनावा,

सोखा किता साहा दा सफर दातिया,

शूकर दातिया तेरा शूकर दातिया,

एह शोरत दी पौड़ी एक दिन डीग ही पेनी है,

एह पैसे दी दोरह ता गिला चलदी रेहनी है,

मेरे पल्ले पा दे तू सबर दातिया,

शूकर दातिया तेरा शूकर दातिया,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।