चिठी धुर दरगाहो

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

चिठी धुर दरगाहो आई सिमरन कर बंदिया,

पहिली चिठी आई कोई कीता ना प्रंबध जी,

होली होली झड़गे तेरे मुहँ वाले दंद जी,

तु ता मुहँ दी शकल गवाई सिमरन कर बंदिया,

चिठी ........

दूजी चिठी आई कोई कीता ने खियाल जी,

होलीहोली धोले होगे सिर दे वाल जी,

थेनं फेर वी समझ नई आई,

सिमरन कर बंदिया,

चिठी .......

तीजी चिठी आई कोई कीता ने खियाल जी,

होली होली बंद होया दिसनो जहान जी,

तेनू कंना तो वी देवे ना सुनाई,

सिमरन कर बंदिया,

चिठी.........

चोथी चिठी आई कोई ना खियाल जी ,

होली होली गोडियां दा होया बुरा हाल जी,

तेरे हॅथ विच सोटी फड़ाई ,

तेरे हथ विच सोटी फड़ाई ,

सिमरन कर बंदिया,

चिठी धुर दरगाहो आई,

सिमरन कर बंदिया,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।