मजबूर हु मैं लाचार हु मैं

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॥ पावन पाठ ॥

मजबूर हु मैं लाचार हु मैं,

मेरी मदत तुझी को करनी है,

साईं मेरे लज्पाल मेरी लाज तुझको को रखनी है,

मजबूर हु मैं लाचार हु मैं,

बाहर से मैं खुश खुश दीखता,

बिहतर से दुखयारा,

एक भयानक सपने जैसा लगता है जग सारा,

एक चिता के जैसी चिंता पल पल भीतर जलती है,

साईं मेरे लज्पाल मेरी लाज तुझको को रखनी है,

मजबूर हु मैं लाचार हु मैं,

रिश्तो का ये कर्ज ये कैसा उतर नही क्यों पाये,

जितना भी झुकता मैं करता उतना बढता जाये,

तकदीरो का खेल है सारा इंसान तो कट पुतली है,

साईं मेरे लज्पाल मेरी लाज तुझको को रखनी है,

मजबूर हु मैं लाचार हु मैं,

जीवन का हर एक भरोसा कच्चे धागों जैसा,

बंध जाने से पहले टूटे बंधन मन का कैसा,

साहिल की हर एक तसली आखिर झूठी निकली है,

साईं मेरे लज्पाल मेरी लाज तुझको को रखनी है,

मजबूर हु मैं लाचार हु मैं,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।