सफर हसीन है मंजिल

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

सफर हसीन है मंजिल का इंतज़ार करो,

सिला मिले न मिले तुम उसी से प्यार करो,

तुम्हारे साथ है साई तो फ़िक्र क्या होगी,

हर विपदा की किसी दिन इंतहा होगी,

लगन तो एक ही इबादत है बार बार करो,

सफर हसीन है मंजिल का इंतज़ार करो,

तुम्हारे नाव लगाएगा वो किनारे से,

वोही हटाये गा तूफ़ान को इक इशारे से,

तुम्हे है उस पे भरोसा तो एतवार करो,

सफर हसीन है मंजिल का इंतज़ार करो,

दिखाई देती है सुबह नए उजालो की,

सजी सजाई है दुल्हन मेरे खयालो की,

अब उठने वाली है ढोली उठो कहार करो,

सफर हसीन है मंजिल का इंतज़ार करो,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।