रंग दे साई अपने रंग में

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॥ पावन पाठ ॥

रंग दे साई अपने रंग में,

ना रहे प्यास कोई मन में न रहे कोई आस मन में,

रंग दे साई अपने रंग में,

रंगा ही ना वो क्या पहचाने,

रंग का मोल रंगीला जाने,

रंगा है जो तेरी लगन में,

रंग दे साई अपने रंग में,

हर मजहब हो रंगे एक रंग,

जो भी है चल पड़े तेरे संग,

सब रंगे हुये तेरी धुन में,

रंग दे साई अपने रंग में,

तू रंग रेंज है रंग ना जाने,

किशन चुनरियाँ की पहचाने,

एहि आस धड़कन में,

रंग दे साई अपने रंग में,

इस जग से मैं जाओ तो मंसा हावी न पाउ तो,

ना रहे प्यास कोई मन में,

रंग दे साई अपने रंग में,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।