सुपना सुनावा कल रात दा

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

सियो सुपना सुनावा कल रात दा,

गुरां नाल गल्लां कितियाँ,

नि मैं सुपने च होई गल बात दा,

सुपना सुनावा कल रात दा.....

सतगुरु आ गए मेरे वेहड़े चानन होया चार चुफेरे,

आंख खुली टा वेहला परभात दा,

गुरां नाल गल्लां कितियाँ,

नि मैं सुपना....

सतगुरु आ गये मेरे भुहे दर्शन कर ले मेरी रूहे,

अंख खुली ता वेला परवाह्त दा,

गुरां नाल गल्लां कितियाँ,

नि मैं सुपना....

सतगुरु आ गये मेरे अंदर मैं ता हो गई मस्त कलंधर,

अख खुली ता वेडा परवाह्त दा,

गुरां नाल गल्लां कितियाँ,

नि मैं सुपना....

जद मैं वेखियाँ आखा खुल सतगुरु बेठे मेरे कोल,

एह ता वेला सी पहली मुलाकात दा,

गुरां नाल गल्लां कितियाँ,

नि मैं सुपना....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।