तू जिहने मर्जी दुःख दे दे

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॥ पावन पाठ ॥

तू जिहने मर्जी दुःख दे दे,

दुःख सेहन दी आद्दत पे गई है,

मेरे सैयां तनु की कहना,

चुप रेहन दी आद्दत पे गई है,

साढ़े चेहरे उते लिखियाँ ने साढ़े दिल उते जो बीतिया ने,

असी भूलना चाहे भुलदे नहीं साढ़े नाल जो जो बिटियां ने,

साहनु मेले चँगे लगदे नहीं वख रेहन दी आद्दत पे गई है,

तू जिहने मर्जी दुःख दे दे,

असी लिख लिख चिठियाँ हार गए असी लब लब तनु हार गए,

की दसिये सैयां दोष मेरे साहनु तेरे विशोदे मार गए,

हूँ हस्सा चंगा लगदा नहीं साहनु रोन दी आद्दत पे गई है,

तू जिहने मर्जी दुःख दे दे

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।