माँ तुझसा और ना कोई

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॥ पावन पाठ ॥

तेरी तुलना किससे करू माँ तुझसा और ना कोई,

जब जब टुटा मेरा खिलौना मुझसे पहले तू रोइ,

तेरी तुलना किससे करू माँ,

कैसे कैसे माँ ने मुझको कैसे बड़ा किया है,

दूध नहीं वो खून है माँ का बचपन में जो माँ का पिया है,

मैं खोया जब अपने ख़्वाब में तू मेरे ख्वाब में खोई,

तेरी तुलना किससे करू....

मेरे हसने पे हस्ती है रोने पे रोती है,

फिर भी मैं ये समज न पाया माँ कैसी होती है,

अपनी हर सांसो से तूने दुनिया मेरी सजोई,

तेरी तुलना किससे करू.....

खोई दौलत शोरत मिलती मिलता है सुख सारा,

अगर हाथ से माँ निकली तो मिलती नहीं दोबारा,

जिस ने हर पल पीड़ा मेरी अपने दिल पे खोई,

तेरी तुलना किससे करू

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।