अब तमना नहीं मांगने की

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॥ पावन पाठ ॥

अब तमना नहीं मांगने की मुझको खरात इतनी मिली है,

सिर झुका है तेरे दर पे मेरा,

बन्दगी अब मेरी ज़िंदगी है,

पल भर में मेरी सोइ तकदीर जगाई,

बरसै दया रेहमत तूने मेरे साई,

तुझसे ही मिला मेरे जीवन को सहारा,

शिरडी का बादशाह है तूने लाखो को तारा,

बेबसों का ठिकाना है ये साई का द्वारा,

नाज करता हु किस्मत पे अपनी तूने सौगात इतनी जो दी है,

अब तमना नहीं मांगने की मुझको

जब संकटो ने पल पल आ मुझको था गेरा,

आया जो मेरे काम बस नाम था तेरा,

तूने ही तूफ़ान रोका करामात दिखाई,

जिसका नहीं है कोई उसका तू है साई,

लाखो को भव तारा बिगड़ी बात बनाई,

ये अँधेरे में थी ज़िंदगानी,

साई तूने ही दी रोशनी है,

अब तमना नहीं मांगने की मुझको

तेरे कर्म ने बदली है ये मेरी ज़िंदगी,

रग रग में साई बस गई है तेरी बंदगी,

भर भर के पाया पैने तुमसे ही खजाना,

ना छोड़ न भवर में साई तू न भूलना,

तेरे बिना न साई मैंने तुझको ही माना,

क्या इनायत मुझपे बरसी,

खिल गई मेरे मन की कली है,

अब तमना नहीं मांगने की मुझको

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।