बलिहारी ऐसे सद्गुरु की

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

आनंद ही आनंद बरस रहा बलिहारी ऐसे सद्गुरु की ।

धन भाग्य हमारे आज हुए शुभ दर्शन ऐसे सद्गुरु के ।

पावन कीनी यह भूमि बलिहारी ऐसे सद्गुरु की ।

क्या रूप अनुपम पायो है जैसे तारो बीच है चंदा ।

सुरत मूरत मोहन वारी बलिहारी ऐसे सद्गुरु की ॥

अंतरा

क्या ज्ञान छटा है जैसे इंद्र घटा बरसत वाणी अमृतधारा ।

वो मधुरी मधुरी अजब धुनी बलिहारी ऐसे सद्गुरु की ॥

गुरु ज्ञान रूपी जल बरसाकर गुरु धर्म बगीचा लगा दिया ।

गुरु नाम रूपी जल बरसाकर गुरु प्रेम बगीचा लगा दिया ।

खिल रही है ऐसी फुलवारी बलिहारी ऐसे सद्गुरु की ॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।