मन रे अवगुण दूर भगा

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॥ पावन पाठ ॥

मन के साधे सब सध जाये,

मुक्ति, मोक्ष,स्वर्ग मिल जाये.

निर्मल मन तो काया निर्मल,

दाग ना मन तू लगा..

मन रे अवगुण दूर भगा.

मन कि शक्ति बड़ी अजब है.

करतब मन के बड़े गज़ब है.

मनमानी तू छोड़ रे मनवा,

खुद को श्रेष्ठ बना…

मन रे अवगुण दूर भगा.

मन ही ईश्वर, मन ही पूजा,

मन के आगे श्रेष्ठ ना दूजा,

मन के मन में अगर प्रेम है,

जगत पति बन जा…

मन रे अवगुण दूर भगा.

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।