ये सोच के माँ ज़िंदगी

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

मुझको भी पाल लेगी जब सारे जग को पाले,

ये सोच के माँ ज़िंदगी की है तेरे हवाले,

अच्छा हु या बुरा हु जैसा हु अब हु तेरा,

एक तेरे सिवा जग में माँ और कौन मेरा,

दे देती अपने मुख के माँ बेटे को निवाले,

ये सोच के माँ ज़िंदगी......

बेटे का टूट जाये कोई अगर खिलौना,

बेटे से पहले माँ को आ जाता है रोना,

बेटे के दुःख को मैया दुःख अपना है बना ले,

ये सोच के माँ ज़िंदगी......

सब वेद पुराणों में माँ को बड़ा बताया,

जिसने जगत रचा है उसको भी माँ ने जाया,

माँ देती जो दुआए रघुवंस कौन टाले,

ये सोच के माँ ज़िंदगी......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।