जोत मेरे सतगुरु वाली

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

जोत मेरे सतगुरु वाली जगदी जरूर जी है,

अखियाँ तो नेड़े नेड़े कदमा तो दूर है,

जेह्डा इस ज्योत नु तके खुले दरबार ओहदे,

मथे ते उते रहंदा सतगुरु दा नूर है,

जोत मेरे सतगुरु वाली जगदी जरूर जी,

दिल कुटियाँ महल बना ले,

सांसा दी पोड़ी ला ले,

गुरा दा सहारा लेके चड़ना जरुर है,

जोत मेरे सतगुरु वाली जगदी जरूर जी

गुरा दे द्वारे जावी चरना दी धुल ले आवी,

चरना दी धूलि दुःख कट दी जरुर है,

जोत मेरे सतगुरु वाली जगदी जरूर जी

धोखा कदे न खावी पैर पीछे न पावी,

गुरा दा सहारा लेके जाना जरुर है,

जोत मेरे सतगुरु वाली जगदी जरूर जी

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।