मांगने की आदत जाती नहीं

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

जैसा चाहो, मुझको समझना, बस इतना ही तुमसे कहना..

मांगने की आदत जाती नहीं, तेरे आगे लाज मुझे आती नहीं..

बड़े बड़े पैसेवाले भी तेरे द्वारे आते हैं,

मुझको हैं मालुम की वो भी तुझसे मांग के खाते हैं..

देने में तु घबराता नहीं, देने में तु घबराता नहीं..

तेरे आगे लाज मुझे आती नहीं..

तुमसे दादा शरम करू तो और कहां मैं जाऊंगा,

अपने इस परिवार का खर्चा बोल कहां से लाऊंगा..

दुनिया तो बिगड़ी बनाती नहीं, दुनिया तो बिगड़ी बनाती नहीं..

तेरे आगे लाज मुझे आती नहीं..

तु ही कर्ता मेरी चिंता, खुब गुजारा चलता हैं,

कहे 'पवन' की तुझसे ज्यादा कोई नहीं कर सकता हैं..

झोली हर कही फैलाई जाती नहीं, झोली हर कही फैलाई जाती नहीं..

तेरे आगे लाज मुझे आती नहीं..

जैसा चाहो, मुझको समझना, बस इतना ही तुमसे कहना..

मांगने की आदत जाती नहीं, तेरे आगे लाज मुझे आती नहीं..

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।