देख कर शिंगार दादी का

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॥ पावन पाठ ॥

देख कर शिंगार दादी मैं ठगा सा रह गया,

मैं ठगा सा रह गया॥

सो सका न रात भर मैं ठगा सा रह गया,

हाथो में मेहँदी रची है पावो में पायल बजी,

देख कर हाथो की लाली मैं ठगा सा रह गया,

देख कर शिंगार दादी.....

माथे पर चुनरी सजी है गोटे तारो से जर्ड्डी,

देख कर चुनरी सुरंगी,मैं ठगा सा रह गया,

देख कर शिंगार दादी.....

फूलो के गजरे सुहाने हर तरफ खुशबु उड़े,

देख कर दरबार दादी,मैं ठगा सा रह गया,

देख कर शिंगार दादी.....

हर्ष दुल्हन सी बनी है पीडी पर बेठी है माँ,

देख कर ममता की मूरत,मैं ठगा सा रह गया,

देख कर शिंगार दादी.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।