आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले

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॥ पावन पाठ ॥

आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले।

मुझको तेरा सहारा सदा चाहिये॥

आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले।

मुझको तेरा सहारा सदा चाहिये॥

चाँद तारे गगन में दिखे ना दिखे।

मुझको तेरा नजारा सदा चाहिये॥

आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले।

मुझको तेरा सहारा सदा चाहिये॥

यहाँ खुशियों हैं कम और ज्यादा है गम।

जहाँ देखो वहीं है, भरम ही भरम॥

मेरी महफिल में शमां जले ना जले।

मेरे दिल में उजाला तेरा चाहिये॥

आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले।

मुझको तेरा सहारा सदा चाहिये॥

कभी वैराग है, कभी अनुराग है।

यहाँ बदले है माली, वही बाग़ है॥

मेरी चाहत की दुनिया बसे ना बसे।

मेरे दिल में बसेरा सदा चाहिये॥

आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले।

मुझको तेरा सहारा सदा चाहिये॥

मेरी धीमी है चाल और पथ है विशाल।

हर कदम पर मुसीबत, अब तू ही संभाल॥

पैर मेरे थके हैं, चले ना चले।

मेरे दिल में इशारा तेरा चाहिये॥

आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले।

मुझको तेरा सहारा सदा चाहिये॥

चाँद तारे फलक पर (गगन में) दिखे ना दिखे।

मुझको तेरा नजारा सदा चाहिये॥

आसरा इस जहाँ का मिले ना मिले।

मुझको तेरा सहारा सदा चाहिये॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।