जय हो जय हो तेरी माँ ज्वाला

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

जय हो जय हो तेरी माँ ज्वाला

( अकबर को, अपनी ताकत पर, बड़ा गुरुर था,

सत्ता के नशे में, शहनशाह चूर था ।

आया था, माँ की ज्योत, बुझाने को वो मगर,

मध्यम हुआ, ज़रा भी ना, ज्योति का नूर था ॥)

सुन लो, सच्ची ये कहानी ।

भक्तो, तुम मेरी, जुबानी ।

ना तो, लोहा, और ना पानी ।

बुझा, पाए थे, ज्योत नूरानी ।

देख हुई, अकबर को हैरानी ।

शर्म से, हो गया, पानी पानी ।

वो बोला, ज्योति का, नूर आला,

जय हो जय हो, तेरी माँ ज्वाला,

जय हो, माँ ज्वाला...

( जय हो, जय हो माँ, जय हो माँ )

जय हो, माँ ज्वाला...

( जय हो, जय हो माँ, जय हो माँ )

जय हो, माँ ज्वाला...

( जय हो, जय हो माँ, जय हो माँ )

जय हो, माँ ज्वाला...

हो मईया, तूँ है, बड़ी महान ।

तेरी, जग में, ऊंची शान ॥

तेरा, रूतबा है, सबसे निराला,

जय हो जय हो, तेरी माँ ज्वाला,

जय हो, माँ ज्वाला...

( जय हो, जय हो माँ, जय हो माँ )

जय हो, माँ ज्वाला...

( जय हो, जय हो माँ, जय हो माँ )

जय हो, माँ ज्वाला...

( जय हो, जय हो माँ, जय हो माँ )

जय हो, माँ ज्वाला...

था, बड़े ही, अहंकार, में वो अकबर ।

बोला, है क्या, कोई जग में, मुझसे बढ़कर ।

सवा, मन का, मै लाया, सोने का छत्तर ।

फिर, छतर पर, पडी माँ की, तिरछी नज़र ।

देखा, सोने, का जो रंग ।

रह, गए थे, सभी दंग ॥

ऐसी, धातु में, माँ ने, बदल डाला,

जय हो जय हो, तेरी माँ ज्वाला,

जय हो, माँ ज्वाला...

( जय हो, जय हो माँ, जय हो माँ )

जय हो, माँ ज्वाला...

( जय हो, जय हो माँ, जय हो माँ )

जय हो, माँ ज्वाला...

( जय हो, जय हो माँ, जय हो माँ )

जय हो, माँ ज्वाला...

चीर, पर्वत की, छाती को, निकली है ये ।

और बिना, तेल बाती के, जलती है ये ।

अपने, भक्तो के, दुःख दर्द, हरती है ये ।

सोई, किस्मत, को उनकी, बदलती है ये ।

प्रेमी, नाम, ले जो तेरा ।

मिटे, लचक अँधेरा ॥

उनके, जीवन में, करती उजाला,

जय हो जय हो, तेरी माँ ज्वाला,

जय हो, माँ ज्वाला...

( जय हो, जय हो माँ, जय हो माँ )

जय हो, माँ ज्वाला...

( जय हो, जय हो माँ, जय हो माँ )

जय हो, माँ ज्वाला...

( जय हो, जय हो माँ, जय हो माँ )

जय हो, माँ ज्वाला...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।