अपने अपने कर्मों का फल

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॥ पावन पाठ ॥

अपने अपने कर्मों का फल

धुन- रातोंको उठ उठ के जिनके लिए रोते हैं

कुछ, मांगने से नहीं मिलता, बिन मांगे मिलता है ॥

अपने, अपने कर्मों का, फल सबको मिलता है ॥

इक पानी, ऐसा होता है, मंदिर में चढ़ता है ॥

इक पानी, ऐसा होता है, नालों में बहता है ॥

दोनों की, धारा एक है, पर अंतर इतना है ॥

अपने, अपने कर्मों का, फल सबको मिलता है ॥

कुछ, मांगने से नहीं मिलता...

इक फूल, ऐसा होता है, मंदिर में चढ़ता है ॥

इक फूल, ऐसा होता है, अर्थी पे चढ़ता है ॥

दोनों की, बगिया एक है, पर अंतर इतना है ॥

अपने, अपने कर्मों का, फल सबको मिलता है ॥

कुछ, मांगने से नहीं मिलता...

इक भाई, ऐसा होता है, महलों में रहता है ॥

इक भाई, ऐसा होता है, गलियों में रहता है ॥

दोनों की, माता एक है, पर अंतर इतना है ॥

अपने, अपने कर्मों का, फल सबको मिलता है ॥

कुछ, मांगने से नहीं मिलता...

इक बहन, ऐसी होती हैं, महलों में रहती हैं ॥

इक बहन ऐसी होती है, किस्मत को रोती है ॥

दोनों की, जननी एक है, पर अंतर इतना है ॥

अपने, अपने कर्मों का, फल सबको मिलता है ॥

कुछ, मांगने से नहीं मिलता...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।