चंगे आ के मंदे हा

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

लगियाँ ने मौजां, लगाई रखी मालका,

चंगे आ के मंदे हां,निभाई रखी मालका,

किसे नु मैं अपना दुखड़ा सुनाया नही,

तेरे वाजो किसे मेनू सीने ना लाया नही,

सीने नाल लाया ऐ ते लाइ राखी मलका,

चंगे आ के मंदे हां.......

नाम तेरा लेके दाता शान आसा पाई है,

तेरे हाथ डोर साड़ी आपे तू चढ़ाई ए,

चढ़ी होई गुडी नु चढाई रखी मलका,

चंगे आ के मंदे हां...........

तू ही तू कवा मैं दाता हर गल गल विच,

आवे न गरूर कदे सैयां मेरे दिल विच

निवेया नु निवा ही बनाई रखी मालका,

चंगे आ के मंदे हां.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।