हे करूणा की सागर हे ममतामयी माँ

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

हे करूणा की सागर

हे करूणा, की सागर, हे ममता, मई माँ ।

मैं तेरा, हूँ माता, मुझे तुम, संभालो ।

मैं चरणों, में तेरे, आन, पड़ा हूँ ।

जगत के‌, भंवर से, मुझे तुम, निकालो ।

हे करूणा, की सागर, हे ममता, मई माँ...

तेरा नाम, है दाती, दीन, दयाला,

है लाखों, को तूने‌, भंवर से, निकाला ।

हूँ मैं भी, तो मईया, उन्हीं से, हूँ बिछुड़ा,

हूँ फूल, जैसे कोई, डाली से, उखड़ा ॥

जगत की, तपिश से, मैं मुरझा, ना जाऊँ ।

मुझे भी, माँ अब तो, गोदी, बिठा लो ।

हे करूणा, की सागर, हे ममता, मई माँ...

तुम्हें, ना पुकारूँ, तो किसको, पुकारूँ,

मैं सपनों, में मईया, तेरी छवि, निहारूँ ।

हो पतितों, की रक्षक, मेरी मात, अम्बे,

तूँ है भक्त, वत्सल, तूँ ही, जगदम्बे ॥

दया मई, दाती, दया अब, तूँ कर दे ।

कि दास, किंचण, को अब माँ, बचा लो ।

हे करूणा, की सागर, हे ममता, मई माँ...

जगत के, झमेलों, ने मुझको, रूलाया,

जो है, सच्ची प्रीती, उसी को, भुलाया ।

ना दर दर, भटकना, मुझे अब, भवानी,

हैं दिल में, जो बातें, तुम्हीं को, सुनानी ॥

मुझे, अपनी यादों, के अश्रु, माँ दे दो ।

माँ अपने, ही आंचल, में मुझको, छुपा लो ।

हे करूणा, की सागर, हे ममता, मई माँ...

तेरे नाम, की ज्योति, हृदय में मेरे,

मेरा ध्यान, मईया जी, चरणों में तेरे ।

परि पकव, हो और, कबहूँ, ना बिसरे,

तेरी भक्ति, करके माँ, पल-पल, ये निखरे ॥

तुम, अपना, के मुझको, माँ अपना, ही कर लो ।

कि अपने, में मईया, जी मुझको, समा लो ।

हे करूणा, की सागर, हे ममता, मई माँ...

माँ की, दया की, तो‌ सीमा, ना होती,

जो बालक, मलिन‌ हो, तो माँ ही, है धोती ।

मेरे मन, को ऐसा, माॅं निर्मल, बना दो,

मुझे माँ, तूँ अपने, ही हाथों, सजा दो ॥

माँ अपने, ही काबिल, मुझे तुम, बना के ।

कि भक्ति, के पथ पर, मुझे माँ, चला लो ।

हे करूणा, की सागर, हे ममता, मई माँ...

मैं पापी, हूँ मईया, तूँ है, पाप भंजन,

तूँ करदे, दया माँ, तूँ कर दे, निरंजन ।

तूँ भोली, तेरे भोले, भाले भंडारी,

वो‌ नंदी, पे‌ बैठे, तूँ सिंह पे, सवारी ॥

तूँ भक्तों, की मईया, तूँ भूलें, भुलाये ।

मेरे पाप, को माँ, तूँ दिल से, भुला दे ।

हे करूणा, की सागर, हे ममता, मई माँ...

माँ तेरी, इच्छा से, ये संसार सारा,

करी, तूने करूणा, मुझे है, पुकारा ।

जहाँ, रखना, अपनी, लग्न में, ही रखना,

मुझे, तेरी भक्ति, का रस है, माँ चखना ॥

मैं, मईया, तेरा हूँ, तेरा ही, रहूँगा ।

मेरे चित्त, को अपने, में माता, लगा लो ।

हे करूणा, की सागर, हे ममता, मई माँ...

ਅਪਲੋਡਰ- ਅਨਿਲਰਾਮੂਰਤੀਭੋਪਾਲ

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।