निर्गुण पंथ निराला साधो निर्गुण पंथ निराला रे

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॥ पावन पाठ ॥

निर्गुण पंथ निराला साधो निर्गुण पंथ निराला रे ॥टेक ॥

नही तिलक नहि छाप धारणा नहि कंठी नहि माला रे

निशदिन ध्यान लगे हिरदे में प्रगटे जोत उजाला रे ॥ १

नहि तीरथ नहि बरत घनेरे नहि तप कठिन कराला रे

सहजे सुमरण होवत घट में सोहं जाप सुखाला रे ॥ २

नहि मूरत नहि है कछु सूरत रूप न रंगत वालारे

सब जग व्यापक घटघट पूरण चेतन पुरुष बिशाला रे ॥ ३

नहि उत्तम नहि नीच न मध्यम सब समान जगपाला रे

ब्रम्‍हानंद रूप पहचानो तजो सकल भ्रम जाला रे ॥ ४

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।