कावड़ लेने में इस बार चला रे मैं भी कावड़ियों के साथ चला रे वो बैठा है पहाड़ों में वो बैठा है गंगा किनारे रे

पारंपरिक
महादेव भजन शिव भजन shiv
॥ पावन पाठ ॥

( तर्ज - पालकी में होके सवार चली रे )

कावड़ लेने में इस बार चला रे

मैं भी कावड़ियों के साथ चला रे

वो बैठा है पहाड़ों में वो बैठा है गंगा किनारे रे

भोले की कावड़ जो भी उठाए

वो जिंदगी में कष्ट ना पाए

करके पूरा विश्वास चला रे

मैं भी कावड़ियों के साथ चला रे....

पहुंचेंगे जब हम गंगा किनारे

मिलेंगे हमको भोले हमारे

भर के ये कावड़ में आज चला रे

मैं भी कावड़ियों के साथ चला रे....

गंगा जल से उनको नहलाउ

चंदन लगा के आरती गाउ

मन में मेरे नया चाव लगा रे

मैं भी कावड़ियों के साथ चला रे....

लकी ओ प्यारे कावड़ उठा ले

दिल तू अपना शिव से लगाले

गा - गा कर मैं तो तान चला रे

मैं भी कावड़ियों के साथ चला रे....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।