की मंगना इंना गैरां कोलो

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

की मंगना इंना गैरां कोलों-2

जो दे कर के पछतावे-2

मंग लै मंग लै सतगुरां तों जेड़ा देंदेया देर न लावे

गैर कोलो मंगी न गुरां तो संगी -2

गैर तो मंगी ना गुरां तों संगी ना

की मंगणा ऐ गैरां कोलों....

मंग लै मंग लै.....

गैरा तो मंगी.....

ऊंचे सिंहासन सतगुरु बैठे, बैठे पए मुस्कांदे-2

जेड़े प्रेमी सिमरन कर दे रज रज दर्शन पांदे-2

गैर तों मंगी ना गुरां तों संगी ना-2

की मंगणा ऐ गैरां कोलो.....

मंग ले मंगलै सतगुरां.....

गैर तो ......

जे रब मिलदा नहातेयां धोतेयां मिलदा डडुआं मचिछयां-2

ऐ रब सच्चा उन्हां नूं मिलदा जिन्हां दियां प्रीतां सच्चीयां,

गैर तों मंगी ना गुरां तों संगी ना,

की मंगणां ऐ गैरां कोलों...

कपड़े धोते तन भी धोता मन क्यों रखेया मैला.-2

जे बन्देया तू नाम न जपेया किवें होवेगा उजाला-2

गैर तो मंगी न ......

की मंगना इंना गैरा-......

दासन दासी अरजा करदी गुनहगार हां भारी-2

सारे अवगुण बक्श दो मेरे दासी हूँ मैं तुम्हारी -2

गैर तों मंगी ना गुरां तों संगी ना,

की मंगणां ऐ गैरां कोलों...

की मंगना ऐ गैरां कोलों,

दे कर के पछतावे,

मंग लै मंग लै सतगुरां तो जेड़ा देंदेया देर न लावे

गैर तो मंगी ना गुरां तों संगी ना,

की मंगणा ऐ गैरां कोलों...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।