हरि गुरु हैं समान, वेद वाणी है प्रमान

सुश्री अखिलेश्वरी देवी
श्री कृष्ण मंत्र कृष्ण भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

हरि गुरु हैं समान, वेद वाणी है प्रमान।

'यस्य देवे परा भक्तिः', यह मंत्र धरु ध्यान।

हरि में ही रह गुरु, गुरु में ही हरि जान।

हरि का ही दास गुरु, गुरु दास हरि जान।

हरि कृपा मिले गुरु, गुरु कृपा हरि जान।

हरि प्राण गुरु जान, गुरु प्राण हरि मान।

'एष वै भगवान्', कह भागवत मान। 'तस्मिंस्तज्जने' सूत्र, नारद बखान।

हरि तो है परोक्ष, प्रत्यक्ष गुरु जान।

जीव को तो दे प्रथम, गुरु ही तत्व ज्ञान।

गुरु साधना करावे, करे दिव्य प्रेमदान ।

याते हरि गुरु दोनों कह, गुरु है महान।

बिनु हरि भक्ति भी हो, गुरु भक्ति तत्व जान।

हरि भक्ति तो 'कृपालु' बिनु, गुरु हो न जान॥

पुस्तक - युगल माधुरी

पृष्ठ संख्या -7

कीर्तन संख्या - 4

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।