श्री अष्ट लक्ष्मी स्तोत्रम्

पारंपरिक
माता दुर्गा स्तोत्र दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

श्री अष्ट लक्ष्मी स्तोत्रम्

==============

सुमनस वन्दित, सुन्दरि माधवि, चन्द्र सहॊदरि, हेममये,

मुनिगण वन्दित, मोक्ष प्रदायनि, मञ्जुल भाषिणि, वेदनुते ।

पंकज़ वासिनि, देव सुपूजित, सद्गुण वर्षिणि, शान्तियुते,

जय जय हे, मधुसूदन कामिनि, आदि लक्ष्मी सदा, पालय माम् ॥ 1 ॥

ॐ... आदि लक्ष्मी नमः ...

अयिकलि कल्मष, नाशिनि कामिनि, वैदिक रूपिणि, वेदमये,

क्षीर समृद्ध भव:, मँगल रूपिणि, मन्त्र निवासिनि, मन्त्रनुते ।

मँगल दायिनि, अम्बुज़ वासिनि, देव गणाश्रित, पादयुते,

जय जय हे, मधुसूदन कामिनि, धान्य लक्ष्मी सदा, पालय माम् ॥ 2 ॥

ॐ... धान्य लक्ष्मी नमः ...

जयवर वर्षिणि, वैष्णवि भार्गवि, मन्त्र स्वरूपिणि, मन्त्रमये,

सुरगण पूजित, शीघ्र फल प्रद, ज्ञान विकासिनि, शास्त्रनुते ।

भवभय हारिणि, पाप विमोचनि, साधु जनाश्रित, पादयुते,

जय जय हे, मधु सूधन कामिनि, धैर्य लक्ष्मी सदा, पालय माम् ॥ 3 ॥

ॐ... धैर्य लक्ष्मी नमः ...

जय जय दुर्गति, नाशिनि कामिनि, सर्व फल प्रद, शास्त्रमये,

रध गज़ तुरग, पदाति समावृत, परिजन मण्डित, लोकनुते ।

हरिहर ब्रह्म, सुपूजित सेवित, ताप निवारिणि, पादयुते,

जय जय हे, मधुसूदन कामिनि, गज़ लक्ष्मी रूपेण, पालय माम् ॥ 4 ॥

ॐ... गज़ लक्ष्मी नमः ...

अयिखग वाहिनि, मोहिनि चक्रिणि, राग विवर्धिनि, ज्ञानमये,

गुणगण वारधि, लोक हितैषिणि, स्वर सप्त भूषित, गाननुते ।

सकल सुरासुर, देव मुनीश्वर, मानव वन्दित, पादयुते,

जय जय हे, मधुसूदन कामिनि, सन्तान लक्ष्मी त्वं, पालय माम् ॥ 5 ॥

ॐ... सन्तान लक्ष्मी नमः ...

जय कमलासिनि, सदगति दायिनि, ज्ञान विकासिनि, गानमये,

अनुदिन मर्चित, कुमकुम धूसर, भूषित वासित, वाद्यनुते ।

कनक धरास्तुति, वैभव वन्दित, शँकर देशिक, मान्यपदे,

जय जय हे, मधुसूदन कामिनि, विजय लक्ष्मी सदा, पालय माम् ॥ 6 ॥

ॐ... विजय लक्ष्मी नमः ...

प्रणत सुरेश्वरि, भारति भार्गवि, शोक विनाशिनि, रत्नमये,

मणिमय भूषित, कर्ण विभूषण, शान्ति समावृत, हास्य मुखे ।

नवनिधि दायिनि, कलिमल हारिणि, कामित फल प्रद, हस्तयुते,

जय जय हे, मधुसूदन कामिनि, विद्या लक्ष्मी सदा, पालय माम् ॥ 7 ॥

ॐ... विद्या लक्ष्मी नमः ...

धिमि धिमि धिन्धिमि, धिन्धिमि-धिन्धिमि, दुन्धुभि नाद, सुपूर्णमये,

घुम घुम घुंघुम, घुंघुम घुंघुम, शँख निनाद, सुवाद्यनुते ।

वेद पूराण, इतिहास सुपूजित, वैदिक मार्ग, प्रदर्शयुते,

जय जय हे, मधुसूदन कामिनि, धन लक्ष्मी रूपेण, पालय माम् ॥ 8 ॥

ॐ... धन लक्ष्मी नमः ...

अष्टलक्ष्मी नम स्तुभ्यं, वरदे काम रूपिणि ।

विष्णु वक्षः स्थला रूढ़े, भक्त मोक्ष प्रदायिनि ॥

शँख चक्र गदाहस्ते, विश्व रूपिणिते जय: ।

जगन्मात्रे च मोहिन्यै मङ्गलं शुभ मङ्गलम् ॥

॥ इति श्रीअष्टलक्ष्मी स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।