जदो दे होए गुरा दे दर्शन

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॥ पावन पाठ ॥

जदो दे होए गुरा दे दर्शन

धुनः सवेरे होए गुरां दे दर्शन अज दिन सोहनां लंघेगा

जदों दे होए गुरां दे दर्शन, लगीयां मौज़ां ई मौज़ां ने।

लगीयां मौज़ां ई मौज़ां ने, लगीयां मौज़ां ई मौज़ां ने ।।

सतगुरु कर किरपा अपनाया। सानूं काों हंस बनाया।

साडी हो गई कंचन काया I लगीयां मौजां ई मौज़ां नेII

सतगुरु खोले दर दरवाज़े। राजा रंक फकीर निवाज़े।

अनहद शब्द नाम धुन बाजे-लगीयां मौजां ई मौज़ां नेII

जदों दे फड़े गुरां दे पल्ले। सेवा सतसंग चले।

साडी हो गई बल्ले बल्ले साधु I लगीयां मौजां ई मौज़ां ने II

सतगुरु दित्ते मेहर दे छट्टे। साडे खुश ने बाल बच्चे I

साडे रोग शोक दुःख कट्टे। लगीयां मौजां ई मौज़ां नेII

सतगुरु नज़र मेहर दी कीती। ज़िंदगी बड़ी ही सोहनी बीती।

कीती गल मधुप हड्ड बीती लगीयां मौजां ई मौज़ां नेII

सुप्रसिद्ध लेखक एवं संकीर्तन आचार्य केवल कृष्ण मधुप (मधुप हरि) अमृतसर।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।