जात पात के छुरा, गा भईया तोर आजादी हवय गा अधूरा

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

जब तक चलही जाती पाती के छुरा ॥

गा भईया तोर आजादी हवय गा अधूरा ॥

रे भईया तोर आजादी हवय गा अधूरा

रे संगी तोर अजादी हवय गा अधूरा

संग म खावय अऊ सुतावय जेन मनखे ह कुकुर ला ॥

जेन मनीखे हा कुकुर ला संगी

हा उहि मनीखे हा मनखे के संग करत हवे दूर छुर ना ॥

करत हावे दूर छुर रे संगी

कतको पापी पाखंडी हे पूरा...

गा भईया तोर आजादी

हमन तो जनमे हनजी महतारी के गरभ ले

महतारी के गरभ ले रे संगी

छुवा मनईया मनीखे मन गा उतरे हे सीधा सरग ले

का उतरेहे सरग ले रे संगी

सच्चा बात ह लागे वोला बुरा...

गा भईया तोर आजादी

जब तक चलही जाती पाती के छुरा ॥

गा भईया तोर आजादी हवय गा अधूरा ॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।