साँची कहे तोरे आवन

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

साँची कहे तोरे आवन से हमरे नगरी में आई बहार गुरु जी,

करुना की सूरत समता की सूरत लाखो में एक हमार गुरु जी,

गुरु वर पुलक सागर जी हमारे जब से इस नगरी में पधारे,

ढोल नगाड़े बजते है दवारे छाई है खुशिया अपार गुरु जी,

साँची कहे तोरे आवन से हमरे ........

संध्या सकारे लगे भगती का मेला कोई ना बेठे अब घर में अकेला,

पूजन भजन के स्वर गूंज ते है अब तो हमारे घर द्वार गुरु जी,

साँची कहे तोरे आवन से हमरे..........

मालवा की माटी को चंदन बनाया आके यहाँ जो प्रवास रचाया,

तन मन से एसी सेवा करे गये देखा गा सारा संसार गुरु जी,

साँची कहे तोरे आवन से हमरे ......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।