घना दिन सो लियो, रे अब तो जाग मुसाफिर जाग

संत कबीर
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॥ पावन पाठ ॥

घना दिन सो लियो, रे अब तो जाग मुसाफिर जाग

पहला सूत्यो मात गरभ में पुन्दा पैर पसार

हाथ जोड़ कर बहार निकल्यो हरी ने दियो बिसराए

जनम तेरा हो लिया रे अब तो जाग मुसाफिर जाग

घना दिन सो लियो, रे अब तो जाग मुसाफिर जाग

दूजा सूत्यो मात गोद में हस हस दन्त दिखाए

बहन भांजी लोट जिमावे गावें मंगलाचार

लाड तेरा हो लिया रे अब तो जाग मुसाफिर जाग

घना दिन सो लियो, रे अब तो जाग मुसाफिर जाग

तीजा सूत्यो पिया सेज में मन में बहुत उछाल

त्रिया चरित इक जाल रचेयो रे हरी ने दियो बिसराए

बिआह तेरा हो लिया रे अब तो जाग मुसाफिर जाग

घना दिन सो लियो, रे अब तो जाग मुसाफिर जाग

चौथा सूत्यो शमशाना में लंबा पैर पसार

कहत कबीर सुनो रे भाई साधो दीनी आग लगाए

दाग तेरा हो लिया रे अब तो जाग मुसाफिर जाग

घना दिन सो लियो, रे अब तो जाग मुसाफिर जाग

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।