दादी मंगल करसी मंगल

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

(तर्ज़ - स्वर्ग से सुन्दर सपनो से प्यारा)

दादी मंगल, करसी मंगल आओ करा मंगल ।

दादीजी नै भोत हीं प्यारो, काम बणसी जी म्हारो ।।

मंगल की गाथा माही, दादीजी विराजे ।

सागे सागे गावे म्हारे, सागे सागे नाचे ।

मंगल घड़ियाँ है मंगल की, आओ करा मंगल ।।

दादीजी नै भोत हीं प्यारो ।।१।।

सोलह श्रृंगार कर, बहु बेटी आई ।

दादी नें भी देखो, बनड़ी बणाई ।

हाथा मेहंदी, माथे चुनड़ी, ओढ़ करा मंगल ।।

दादीजी नै भोत हीं प्यारो ।।२।।

मावस की मावस नीतु मंगल गावे ।

बेटापोता धन और दौलत, दादी सूं पावे ।

घणी सकलाई है मंगल की, आओ करा मंगल ।।

दादीजी नै भोत हीं प्यारो ।।३।।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।