बिन सतगुर के दूजा कोई नज़र न आये

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

जग सागर से नैया मेरी पार लगाये।

बिन सतगुर के दूजा कोई नज़र न आये।

जग सागर से.......।

हर चौराहे हर इक मोड़ पे अटक रहा था

माया नगरी की गलियों में भटक रहा था

भटक रहे इस राही को सही राह दिखाये।

जग सागर से......।

बिन भक्ति के जीवन की हर बात अधूरी

सेवा और सुमिरण से जुड़ना क्यों है ज़रूरी

आवागमन और मुक्ति के मुझे भेद बताये।

जग सागर से.......।

दया धर्म को भूल चला था रब्ब का बंदा

सच्चा सौदा छोड़ करे क्यूँ झूठ का धंधा

काम के दीवाने को सतगुरू राम रटाये।

जग सागर से......,।

'शान्त' जो पूरा करना है मुक्ति का सपना

भक्ति भाव के रंग में रंग ले जीवन अपना

एक श्वास भी नाम बिना,बिरथा न जाये।

जग सागर से.......।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।