सूनी कलाई तेरी देख नहीं पाऊं हर साल राखी तुम्हें बाँधने मैं आऊं

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॥ पावन पाठ ॥

सूनी कलाई तेरी देख नहीं पाऊं

हर साल राखी तुम्हें बाँधने मैं आऊं

आज मेरी बहना तुझे लाड मैं लडाऊ

राखी वाला दिन मैं भी भूल नहीं पाऊं

भैया मेरी शान रखना मेरा ध्यान

मत होना परेशान रखो मैं तेरा ध्यान

बड़े भाग्यशाली होते हैं वो घर बहने जिस घर आती

बिन भाई के बहन बेचारी रो रो कर रह जाती

तुझसे ही जग मैं सम्मान मैं भी पाऊं

हर साल राखी तुम्हें बाँधने मैं आऊं...

भैया मेरा राज दुलारा जैसे दिया बाती

जब जब बहने घर मैं आएं, खुशियां संग हे लाती

तेरे बिना भैया मैं भी रह नहीं पाऊं

राखी वाला दिन मैं भी भूल नहीं पाऊं

हर साल राखी तुम्हें बाँधने मैं आऊं...

धन दौलत मैं कुछ नहीं मांगूं, सर पे रख दो हाथ

जब तक सांस चलेगी मेरी मैं भी निभाउंगा साथ

हे सागर से गहरा रिश्ता सबको समझाऊं

राखी वाला दिन मैं भी भूल नहीं पाऊं

हर साल राखी तुम्हें बाँधने मैं आऊं...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।