सतगुरु से डोर अपनी क्यूँ ना बावरे लगाए

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॥ पावन पाठ ॥

सतगुरु से डोर अपनी क्यूँ ना बावरे लगाए,

ये सांस तेरी बन्दे फिर आये या ना आये,

दो दिन का है तमाशा ये तेरी जिंदगानी,

पानी का है बताशा पगले तेरी कहानी,

अनमोल जिंदगी को क्यों मुफ्त में गवाएं,

ये सांस तेरी बन्दे फिर आये या ना आये।

सतगुर से डोर अपनी .........

कल का बहाना करके तूने जिंदगी बिताई,

बचपन जवानी बीती बुढ़ापे की रुत है आई,

अब भी तू जाग बन्दे मौका निकल ना जाये,

ये सांस तेरी बन्दे फिर आये या ना आये।।

सतगुर से डोर अपनी.......

आये है लोग कितने आकर चले गए है,

कारून के जैसे कितने सिकंदर चले गए है,

माया महल खजाने ना साथ ले जा पाए,

ये सांस तेरी बन्दे फिर आये या ना आये,

सतगुरु से डोर अपनी.......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।