पंछी की तरह घूमता ही रहा हूं मैं

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॥ पावन पाठ ॥

पंछी की तरह घूमता ही रहा है तू,

कभी धरती पर कभी अंबर में उड़ता ही रहा है तू,

पंछी की तरह......

जीवन का सफर कितना बेखबर,

एक पल की भी ना है जिसकी खबर,

ऐसे बेखबर जीवन को ढूंढता ही रहा है तू,

पंछी की तरह......

काया की कुटी में रहता है तू,

मोह माया में फिर क्यों बहता है तू,

कभी इस देह में कभी उस देह में रमता ही रहा है तू,

पंछी की तरह......

प्रभु की शरण में ध्यान लगा,

वासनाओं को तू श्मशान भगा,

कभी विषियो में कभी तृष्णा में फंसता ही रहा है तू,

पंछी की तरह......

डॉ सजन सोलंकी

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।