धुपां दा नहीं डर मैंनु , छावां मेरे नाल ने

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॥ पावन पाठ ॥

धुपां दा नहीं डर मैंनु , छावां मेरे नाल ने ॥

लोको मेरी माँ दिया, दुआवां मेरे नाल ने ॥

शिखर दुपहरे जदो याद माँ दी आंदी ऐ॥

लगदा ऐ ठण्डियाँ हवावां मेरे नाल ने ॥

धुपां दा नहीं डर मैंनु , छावां मेरे नाल ने ॥

लोको मेरी माँ दिया, दुआवां मेरे नाल ने ॥

माँ दे पैर चुम के में जदो घरो टुरना ॥

लगदा ऐ मंज़िला ते रावां मेरे नाल ने ॥

रोग भावे लखां ने पर मेरी माँ दा सदका॥

लोड़ नहीं दवाईयाँ दी शफाफा मेरे नाल ने॥

धुपां दा नहीं डर मैंनु , छावां मेरे नाल ने ॥

लोको मेरी माँ दिया, दुआवां मेरे नाल ने ॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।