भटकता डोले काहे प्राणि

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॥ पावन पाठ ॥

भटकता डोले काहे प्राणी,

भटकता डोले काहे प्राणी,

चला आ प्रभु की तू शरण मे,

संवर जाएगी ये जिंदगानी,

भटकता डोले काहे प्राणी.......

भटकता डोले काहे प्राणि,

भटकता है क्यों मोह माया मे,

ये काया तेरी आनी जानी,

भटकता डोले काहे प्राणी......

भटकता डोले काहे प्राणि,

भटकना तेरा भक्ति पथ से,

तुझे प्रभु कृपा की है हानि,

भटकता डोले काहे प्राणी......

भटकता डोले काहे प्राणि,

भटकने वाले दुख पाते है,

अगर बदले मन मे नादानी,

भटकता डोले काहे प्राणी......

भटकता डोले काहे प्राणि,

करो नित सुमिरन राम का रे,

रहे तेरे जीवन मे खुशहाली,

भटकता डोले काहे प्राणी......

भटकता डोले काहे प्राणि,

चला आ शिव की तू शरण में,

संवर जाएगी ये जिंदगानी,

भटकता डोले काहे प्राणी......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।