अपने ही कर्मों का दोष

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॥ पावन पाठ ॥

अपने ही कर्मों का दोष पिताजी काहे को ब्याह दई विदेश....

जब रे पिताजी मेरा जन्म हुआ था,

मैया पड़ी बेहोश पिताजी काहे को ब्याह दई विदेश.....

जब रे पिताजी मेरी छठी पूछी थी,

दिवला जले सारी रात पिताजी काहे को ब्याह दई विदेश....

जब रे पिताजी मेरी लगून लिखी थी,

सखियों के नैनों में नीर पिताजी काहे को ब्याह दई विदेश.....

जब रे पिताजी मेरी पड़ी रे भमरिया,

पंडित पढ़े वेद मंत्र पिताजी काहे को ब्याह दई विदेश.....

जब रे पिताजी मेरी डोली सजी थी,

भैया के नैनों में नीर पिताजी काहे को ब्याह दई विदेश......

जब रे पिताजी मेरी हुई विदाई,

मैया ने खाई पछाड़ पिताजी काहे को ब्याह दई विदेश.....

जब डोली बागों में पहुंची,

कोयल ने बोले बोल पिताजी काहे को ब्याह दई विदेश.....

तू क्यों बोले बन की कोयलिया,

छोड़ा बाबुल का देश पिताजी काहे को ब्याह दई विदेश......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।