बोल पड़ी मंदिर की देवी

पारंपरिक
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

बोल पड़ी मंदिर की देवी क्यों मंदिर में आया रे,

घर बैठी तेरी जननी माता क्यों ना भोग लगाया रे।

मेरी कढ़ाई देसी घी की मा ने सूखी रोटी रे,

घर में मां का साझा कोन्या क्यों तेरी किस्मत फूटी रे,

नजर मिलाना छोड़ दिया तने नजर का टीका लाया रे,

घर बैठी तेरी जननी माता क्यों ना भोग लगाया,

बोल पड़ी मंदिर की देवी क्यों मंदिर में आया रे,

घर बैठी तेरी जननी माता क्यों ना भोग लगाया रे......

जगमग जगमग ज्योत जगावे मां के पास अंधेरा रे,

वह भी मां से मैं भी मा सू के तने ना बेरा रे,

अपनी मा ने तो दमड़ी ना देता मुझसे मांगने आया रे,

घर बैठी तेरी जननी माता क्यों ना भोग लगाया,

बोल पड़ी मंदिर की देवी क्यों मंदिर में आया रे,

घर बैठी तेरी जननी माता क्यों ना भोग लगाया रे......

कड़वे कड़वे वचन बोलकर नरम कलेजा छोलया रे,

एक सुनू ना तेरी रे बेटा कौन से मुख से बोला रे,

मां ममता की मूरत होवे नहीं समझ में आया रे,

घर बैठी तेरी जननी माता क्यों ना भोग लगाया,

बोल पड़ी मंदिर की देवी क्यों मंदिर में आया रे,

घर बैठी तेरी जननी माता क्यों ना भोग लगाया रे......

सुन लो भक्तो मां की वाणी माता सभी के पास है,

जो भी मां की सेवा करता मिलता उसे सुख सात है,

तीर बाण की ठोकर लगी फेर समझ में आया रे,

घर बैठी तेरी जननी माता क्यों ना भोग लगाया,

बोल पड़ी मंदिर की देवी क्यों मंदिर में आया रे,

घर बैठी तेरी जननी माता क्यों ना भोग लगाया रे......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।