पंखिड़ा तू मोतियों की ला बाहर रे

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॥ पावन पाठ ॥

पंखिड़ा तू मोतियों की ला बाहर रे, पंखिड़ा तू फूलों की ला बाहर रे;

मेरे वीर का है आज जन्मोत्सव रे, त्रिशला नंदन का है आज जन्म दिवस रे....

नगरी नगरी में जाके बजा दे तू थाल, आज धरती पे जन्मे है त्रिशला के लाल;

जिनको गोद में बिठाए हैं मेरु गिरिराज, जिनको नव्हन कराते हैं इंद्र महाराज;

देव देवियां रुमझुम नाचे मंगल गाए रे,

पंखिड़ा....

दूर पावन नदी से तू पानी ले आ, उनके प्यारे से चरणों में नव्हन करा;

दूर अंबर से कोई सितारा तो ला, उनके माथे पे टीका लगाऊं जरा;

चंपा चमेली फूलों का पालना रे, सोए मेरे वीरजी मिंठी नींद रे,

पंखिड़ा...

जाके काली घटा से तू काजल ले आ, उनकी कजरारी आंखों में अंजन लगा;

उनके केशुओं में चंदन की खुशबू बसा, उनके नाज़ुक से हाथों में राखड़ी सजा;

हार लाओ कुंडल लाओ मुकुट लाओ रे, मेरे वीर का एजी करूं श्रृंगार रे,

पंखिड़ा...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।