जग के रचैया खेल खिवैया

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॥ पावन पाठ ॥

सिर पे साफा कन्धे पे झोली अद्बुत रूप बनाया है,

ओ रे जग के रचैया खेल खिवैया तेरा खेल समज न आया है,

अपना घर न कभी ना बनया लाखो को घर बार दिए,

नीम के निचे आ कर बाबा शिर्डी का उधार किये,

साचा दवार कमाई झोली तुमने उठाई तूने धुनी अखंड जलाया है,

ओ रे जग के रचैया खेल खिवैया......

कोई तुझको हिन्दू कहता कोई मुस्लिम कहता है,

सबका मालिक एक तू ही सबके दिल में रहता है,

बाबा तेरी समादी हरती है सब वयादी मन हर ने तेरा गुण गया है,

ओ रे जग के रचैया खेल खिवैया...

सिर पे साफा कन्धे पे झोली अद्बुत रूप बनाया है,

ओ रे जग के रचैया खेल खिवैया तेरा खेल समज न आया है,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।