गुरुजी मेरे तुम समरथ तुम ज्ञानी

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॥ पावन पाठ ॥

गुरुजी मेरे तुम समरथ तुम ज्ञानी,

तेरे आगे कुछ भी छिपे नहीं, दूध का दूध और पानी का पानी,

गुरुजी मेरे तुम.....

मैं मुरख मैं मैं में डूबा, कमी क्रोधी अभिमानी,

बांह ग्रहीं तुने पास बिठाया, मैं हूं अधम अज्ञानी,

गुरुजी मेरे तुम.....

अमाप आत्मिक प्रेम प्रवाह में, मस्त सदा मस्तानी,

दोऊं कर लिए परसाद लुटावे, लीला बरणी न जानी,

भक्त लूटै भगवान लुटावै, कृपा सिंधु कल्याणी,

गुरुजी मेरे तुम.....

सच्चिदा ते संत कहेगा, है अमृतमय बाणी,

दिल दर्पण में दाग न कोई, कोई न ऐसा दानी,

डूब गया सो पार उतरता, छोड़ नफा नुकसानी,

गुरुजी मेरे तुम.....

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।