साईं मैं होता तेरे दर का मोर

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

साईं मैं होता तेरे दर का मोर,

ख़ुशी मानता दर्शन पाता,तेरे दवार पे करता छोर,

साईं मैं होता तेरे दर का मोर,

मैं तेरे अस्थान का पत्थर होता,

मैं तेरे चरणों का कंकर होता,

तेरे चरण को चूम ता साईं,

तुम मेरे चित चोर,

साईं मैं होता तेरे दर का मोर

साईं मैं तेरे जिस्म का कपडे होता,

पाक शरीर से तेरे लिपटा रहता,

बांध के अपने मुझको देख ता आप की और,

साईं मैं होता तेरे दर का मोर...

साईं में तेरे पानी का होता प्याला,

बाबा जादू प्यार का तुमने डाला,

तेरी राह की धुल में होता,

मेरे कन्हिया किशोर,

साईं मैं होता तेरे दर का मोर..

साईं मैं तेरे दवार का घंटा होता हर दम दवार तेरे बजता रहता,

जी भर के मैं दर्शन करता साईं चंदा मैं चकोर,

साईं मैं होता तेरे दर का मोर...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।