नीलकंठ पर्वत पर चढ़ गयो रे

पारंपरिक
महादेव भजन शिव भजन shiv
॥ पावन पाठ ॥

नीलकंठ पर्वत पर चढ़ गयो रे,

आज भोला फूलों से सज गयो रे,

नीलकंठ पर्वत पर चढ़ गयो रे,

आज भोला बेलपतोंसे सज गयो रे.....

भोले की जटा मैं गंगा विराजे,

गंगा से अमृत बरस गयो रे,

आज भोला फूलों से सज गयो रे,

नीलकंठ पर्वत पर चढ़ गयो रे,

आज भोला बेलपतोंसे सज गयो रे.....

भोले के गले मैं मुंडो की माला,

गले में सर्प लिपट गयो रे,

आज भोला फूलों से सज गयो रे,

नीलकंठ पर्वत पर चढ़ गयो रे,

आज भोला बेलपतोंसे सज गयो रे………

भोले के हाथों मैं त्रिशूल विराजे,

त्रिशूल में डमरू लटक गयो रे,

आज भोला फूलों से सज गयो रे,

नीलकंठ पर्वत पर चढ़ गयो रे,

आज भोला बेलपतोंसे सज गयो रे………

भोले के संग मैं गौरा विराजे,

गोदी मैं गणपति बैठ गयो रे,

आज भोला फूलों से सज गयो रे,

नीलकंठ पर्वत पर चढ़ गयो रे,

आज भोला बेलपतोंसे सज गयो रे………

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।