प्रेम नदिया की सदा उल्टी बहे धार

पारंपरिक
श्री कृष्ण भजन कृष्ण भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

कौन पावे याको पार, प्रेम नदिया की सदा उल्टी बहे धार.....

देखो मैं सुनाऊं एक बात अनमेल,

ब्रह्म निराकार रह्यो गोकुल में खेल,

नंद यशोदा के द्वार,

प्रेम नदिया की सदा उल्टी बहे धार.....

जननी की गति दई पूतना कुँ दे,

विष देने आई पाई मुक्ति खेलम खेल,

खुले स्वर्ग के किवाड़,

प्रेम नदिया की सदा उल्टी बहे धार.....

तीन पैर भूमि याने बली लियो छली,

चौखट न लांघी जाए रह्यो सो मचल,

याने खम्भ दियो फाड़,

प्रेम नदिया की सदा उल्टी बहे धार.....

गोपी बन्यो शिव जाने काम कियो ढेर,

ठुम ठुम नाचे हंसे गोरा मुंह फिर,

नंदी बैल को सवार,

प्रेम नदिया की सदा उल्टी बहे धार.....

प्रेम को प्रमुख यही वृंदावन धाम,

प्रेम हित पायो श्याम रसिया को नाम,

याहे जाने कहां गंवार,

प्रेम नदिया की सदा उल्टी बहे धार.....

श्री देवशरण जी

श्री धाम गोवर्धन

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।